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Harish Bhatt

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महिला की असली दुश्मन महिला

Posted On: 22 Oct, 2010 Others में

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महिला अधिकारों की बात करने वाले क्यों भूल जाते है कि महिला की सबसे बड़ी दुश्मन महिला ही होती है. किसी भी महिला के जुल्मोसितम की तह में जाने पर पता चल जाएगा कि उसकी सूत्रधार एक महिला ही है. अब दहेज उत्पीडऩ का मामला हो या दहेज हत्या का. दोनों ही मामलों में पर्दे के पीछे से सास या ननद का ही चक्रव्यूह रचा हुआ होता है, और फंस जाता है वह पुरुष जो दिन भर की भागदौड़ के बाद थकामांदा घर लौटता है और पागल हो जाता है घर में मचे कोहराम को सुनने देखने के बाद. क्योंकि वहां पर सास यह भूल जाती है कि वह भी कभी बहू थी या ननद को पता नहीं होता कि वह भी कभी किसी के घर की बहू बनेगी. और कहते है न कि अपने की हजार गलती माफ. और बहू, जिसको अभी इस घर में आए चार दिन भी नहीं हुए, को इस घर में अपनी विश्वसनीयता और महत्ता साबित करने में बहुत लंबा वक्त लगेगा, वह वक्त से पहले की टूट जाती है, उसके प्रतिरोध से ही शुरू होती है जुल्मोसितम की ऐसी दास्तां, जो उसकी जान लेकर ही खत्म होती है. हां, ऐसा उन घरों में नहीं होता, जहां सुशिक्षित व समझदार मां सास बनने से पहले ही अपनी बेटी को अहसास करा देती है कि वह भी बहू किसी के घर की बहू बनेगी. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ऐसा उस समाज में हो रहा है, जहां पर महिलाएं सत्ता के सर्वोच्च शिखरों पर विद्यमान है. समझ नहीं आता कि जब एक मां बड़े अरमानों से दूसरे की बगिया का महकता फूल अपने घरआंगन के लिए लेकर आती है, तो उसको मसलने की कैसे सोच लेती है. दहेज उत्पीडऩ या दहेज हत्या पर पूर्ण रूप से रोक लगाने में खुद महिला ही सक्षम है, क्योंकि घरघर की कहानी की असली लेखक व सूत्रधार वह स्वयं ही तो है.

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kamryn के द्वारा
October 17, 2016

Big help, big help. And supitlareve news of course.

abodhbaalak के द्वारा
October 24, 2010

हरीश जी, आपने इस विषय को बड़ी ही गंभीरता से लिखा है, और एक नया आयाम दिया है, सराहनीय लेख के लिए बधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    harishbhatt के द्वारा
    October 25, 2010

    सर आपने लेख को सराहा, उसके लिए आभार. जैसा मुझको महसूस होता है. वही लिखने की कोशिश करता हूँ.

roshni के द्वारा
October 24, 2010

हरीश जी, हाँ कही कही अभी भी सासन अपनी बहु पैर जुल्म करती है चाहे वोह direct हो या indirect क्युकी आज की सास भी समजदार हो गयी है जो सीधे सीधे ताने नहीं मरती बस वोह भी बेटे को ही मोहरा बनाती है .. और बहु आज की तो बहु पहले ही सोच लेती है की सास को किस तरह काबू करना है उससे किस तरह लड़ाई में जितना है और जहाँ तक हो सके उससे दूर ही रहना है…. चलिए ये तो सदियों पुरनी रीती ही बन गयी है …… पता नही कब ये दोनों प्यार से रहना सीखेगी

    harishbhatt के द्वारा
    October 25, 2010

    आपने लेख को सराहा. इसके लिए आपका आभार.

Sanjay के द्वारा
October 23, 2010

बात बहुत सही है. अगर सास (जो खुद एक महिला है) चाहे तो दहेज़ उत्पीडन और दहेज़ हत्याओं पर रोक लग सकती है.

aftabazmat के द्वारा
October 23, 2010

माननिये भट्ट जी, मैं आपकी बात से इत्तेफाक रखता हू, आपने एक लम्बे समय से चले आ रहे मुद्दे को एक नए अंदाज़ में पेश किया है, लेकिन अब बहू पर सास का हुक्म कम ही चलता है. महिला अब पोवेरफुल हो चुकी है. अच्छी पोस्ट के लिए बधाई.

Ravi shukla के द्वारा
October 23, 2010

सर लगता है आप टीवी सीरियल ज्यादा देखते है और वही मानसिकता आपके दिमाग पर हावी हो गयी है घर से बहार निकलकर देखिये जमाना बदल गया है और आज बहुओं ने भी बेटियों का दर्ज़ा प्राप्त कर लिया है.

    bkkhandelwal के द्वारा
    October 23, 2010

    jatada na kah kar itna hi kahnuga ki sirji ne bahut hi satya likha hai aaj bhi hamarey desh kimodern saas aur uski family bhi anpadh saas se jyada bahu dahej kam laaney per sattati hain aur inka yeh bhi kahana bahu ko sataney meie ek any mahila ka sahyog bhi hota hai issmeay kahna kuch galat nahi ki mahila hi mahila ki purnd doshi hoti hai maie issmeay sahi baat ya ghuma phira ke bhi likh dunga ek mahila nahi kai mahilao ka jattha mujhe nahi bakeseyga unke haath itney lambey ki kanoon ki jadon tak hain unkey baarey meie likha hai battana hai ki mahilon ki mahila dushman hoti yeh koi t.v.serial kahani nahi ek mahila ke upper attyachar ki baateie hain aur woh bhi jab mahila pregnent thi duniya meie dusht attayachiriyon ki kamnahi ravan roop jaisi bhi mahilayen hain kuch unko samjahna bhagwan bhi kahtey hain naari ka chartie khud brahmaji nahin jaan paaye iss duniya meie har therey ke log hain jahan achey log hain wahan burey log bhi hain

komal negi के द्वारा
October 22, 2010

सर आपने बहुत अच्छा लिखा है. शायद काफी हद तक आप सही भी हैं, लेकिन मेरा मानना है की कई बार न चाहते हुए भी महिलाएं दोषी बन जाती हैं. ये सब परिश्थितियों के कारण होता है. अगर हम सशक्त होकर अपनी शम्ताओं को पहचानने लगें तो हमें अधिकारों की लड़ाई लड़ने की जरुरत नहीं होगी. अधिकार खुद ही हमें मिल जायेंगे.


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