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Harish Bhatt

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आज जरुरी है संयुक्त परिवार की खुशबू

Posted On: 26 Nov, 2010 Others में

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जितनी तेजी से हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं बदल रही है, उतनी ही तेजी से संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवार में बदल रहे है. जब किसी भी चीज के टूटने का क्रम शुरू होता है, वह अपने अंतिम समय तक टूटती रहती है, फिर उसको कितना भी बचाओ, उसकी दरारे गहराती ही जाती है. क्योंकि जिस प्रकार कांच के टुकड़ों को कितना भी जोड़ा, दरारे साफ नजर आती है. परिवार इंसानों से ही बनते है और आज इंसान अपनी रोजी-रोटी के लिए यहां-वहां भटक रहा है. ऐसे में अगर एक बार अपने घर-परिवार से कदम बाहर निकले तो समझो, यह कदम शायद ही अगले 30 – 40 साल तक वापस अपने घर में लौटेंगे. फिर इतने समय में बच्चे दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, बुआ या नाना-नानी, मौसी या मामा के प्यार को बेगाने माहौल में परायों के बीच ढूंढते हुए इतने बदल जाते है कि वह अपने संस्कारों को अपनाने से भी डरते है. आज सबसे बड़ा ज्वलंत सवाल सामने आ रहा है शादी के कुछ महीनों या सालों बाद तलाक का. इसकी वजह साफ नजर आती है, दो इंसानों की सोच एक नहीं हो सकती है. इस सोच को एक करने के लिए जिस माध्यम की सबसे बड़ी भूमिका होती है वह है संयुक्त परिवार. पति रूठे तो भाभी ने मनाया, पत्नी रूठी तो ननद ने प्यार से समझा दिया. ज्यादा हुआ तो सभी ने मिल बैठ कर बीच का रास्ता निकाल दिया और बच गया वह छोटा सा घरौंदा जिसको अभी जीवन के अनगिनत पहलुओं से रूबरू होना है. अब इसे संयुक्त परिवार का डर कहो या प्यार, कि नए-नवेले रिश्ते टूटने की बजाए और मजबूत हो जाते है. बस यही बात आज के एकल परिवारों में नहीं हो सकती है, जहां पति-पत्नी में जरा सी बात पर मनमुटाव क्या हुआ, वही इस जरा सी बात को पहाड़ बनाने के लिए इतने हमदर्द मिल जाते है कि दोनों को पति-पत्नी के रूप में जीवन बिताना नरक जैसा लगने लगता है, फिर इसकी परिणति तलाक के रूप में ही सामने आती है. रोजगार की तलाश में दूसरी जगह पर एक छोटा सा घर या बड़ा सा मकान तो बनाया जा सकता है और उसको पैसे की ताकत के बल पर बाह्य सुखसुविधा की हर वस्तु से सुसज्जित भी किया जा सकता है. लेकिन उसको अपने परिवार की खुशबू से नहीं महकाया जा सकता. साथ ही उसमे बचपन के खट्टे-मीठे यादगार लम्हों को महक भी नहीं होती. अगर संयुक्त परिवारों में नहीं रहना हमारी मजबूरी है, तो हम अपने एकल परिवारों में अपने बच्चों के लिए छोटा सा परिवार तो बनाकर रख ही सकते है, जहां वह दादा-दादी, नाना-नानी के प्यार की छांव में खेलते-कूदते और संस्कारों को सीखते हुए बड़े हो, (भले ही कुछ समय के लिए) वैसे भी बच्चों का गांव वह होता है, जहां पर उनके दादादानी या नानानानी का घर. संयुक्त परिवार तो टूटने के कगार पर है ही पर हम अपनी कोशिशो से एकल परिवारों में संयुक्त परिवारों की खुशबू तो महका ही सकते है. अब यह हमारी सोच पर निर्भर करता है कि आखिर हम चाहते क्या है?

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Marlie के द्वारा
October 17, 2016

Free knowledge like this doesn’t just help, it promote decmroacy. Thank you.

riya के द्वारा
July 12, 2014

bahut badhiya….its the truth….:)

sudesh poswal के द्वारा
November 1, 2012

परिवार में मुखियाओं का महत्व खत्म : समाज एक आदमी नही बनता उसके लिए परिवारों की जरूरत होती है ! एक आदमी से परिवार बनता है एक परिवार से एक गाँव और फिर एक समाज बनता है !पहले संयुक्त परिवार होते थे और परिवार के मुखिया उच्च विचारों के होते थे !परिवारों में बहुत अनुशासन होता था एक दुसरे के प्रति प्यार त्याग ,और समर्पण की भावना होती थी !लेकिन जैसे -जैसे परिवार के मुखिया बोग विलासिता में पड़ने लगे उनका वर्जस्व खत्म होने लगा और परिवार बिखरने लगे और समाज में नई नई समस्याएँ जन्म लेने लगी !जरूरत है सामाजिक सोच बदलने की गुरुओ , महिलों,बुजुर्गो ,और बच्चो का सम्मान देना होगा हर स्तर पर मन का लालच त्यागना होगा…………………सुदेश पोसवाल

Akshat के द्वारा
January 31, 2011

dude i think this totally wrong because joint families are difficult to exist sorry if u mind but this is totally crap

    Akshat के द्वारा
    March 4, 2011

    dude please reply me back atleast its been a month i have not received a reply!!!!!!!

    Harish Bhatt के द्वारा
    March 5, 2011

    askshat ji namastey, yeh mere nizi vichaar hai. yah jaruri nahi ki aap bhi isse sahamt ho par sayunkt parivaar ki ahmiyat ko kam nahi aanka jaa sakta hai

आर.एन. शाही के द्वारा
November 28, 2010

हरीश जी, संयुक्त परिवारों का विघटन आज हमारी दुखती रग है, जिसमें हल्की फ़ूंक मारने से भी दर्द होता है । परन्तु हम निदान के लिये कुछ अधिक कर पाने के मामले में बिल्कुल लाचारी की स्थिति में पहुंच चुके हैं । रोजगारपरक व्यवस्था ने इसकी शुरुआत की थी, परन्तु आज विखंडन के बहुत सारे कारक एकदूसरे में गड्डमड्ड हो चुके हैं, जिनकी गुत्थियां सुलझ पाना मुमकिन नहीं । बूढ़े दादा-दादी, नाना-नानी को बच्चों के पास बुला लेना आसान होता है, परन्तु उनके सम्मान-स्वाभिमान की संरक्षा सुनिश्चित करते हुए, लम्बे समय तक संयुक्त परिवार के माहौल को जिलाए रखने की मानसिकता आज के पति और पत्नी दोनों में कितने दिनों तक जीवित रह सकती है, यह भी एक मुश्किल सवाल है ।

    harish Bhatt के द्वारा
    November 28, 2010

    आदरणीय शाही जी नमस्ते, आपकी प्रतिक्रिया हमेशा और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करती है. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार.

    abhinav के द्वारा
    October 29, 2011

    ल वहिगूदग6बू

Raghav के द्वारा
November 28, 2010

हरीश जी आपने कहा तो सही है पर आज के युवा की मजबूरी है कि वह रोजगार के कारण चाहते हुए भी अपने परिवार के साथ नहीं रह पाता. बधाई.

    sudesh poswal के द्वारा
    November 1, 2012

    भाई जी : मैं आपकी बात से सहमत नही हूँ क्या पहले रोजगार नही थे ! क्या बच्चे माँ-बाप को छोड़कर देश विदेश नही जाते थे !वेश परिवेश सब कुछ बदल गया है हमारी सभ्यता ,संस्कृति और रही सही कसर टीवी .फ़ोन ने पूरी कर दी बच्चो और बडो सभी के पास अपने परिवार के लिए टाइम नही रहा ! होटल क्लबो में तो टाइम दे सकते है परन्तु परिवार को नही ………सुदेश पोसवाल

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 28, 2010

अब नाना नानी, दादा दादी, घरों मे न होकर वृद्धा आश्रमों मे पहुँच गए है………… तो कैसे इनसे बच्चों को संस्कार मिलें…………….. अच्छे लेख के लिए बधाई…….

    harishbhatt के द्वारा
    November 28, 2010

    सच कहा आपने जब नाना नानी, दादा दादी, घरों मे न होकर वृद्धा आश्रमों मे पहुँच गए है, तो फिर कैसे इनसे बच्चों को संस्कार मिलें. आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद.

anil kushwaha के द्वारा
November 27, 2010

भाई हरीश जी सयुंक्त परिवार अब बीते ज़माने की बात हो गई है. आज की गर्ल्स आजादी चाहती हैं. आने वाले समय मई और भी बुरी स्थिति होने वाली है. हम कितनी भी कोसिस कर ले आज का युवा अपने मन की ही करेगा इसमें सबसे बड़ा रोल मीडिया और टीवी का है.

    harishbhatt के द्वारा
    November 28, 2010

    कुशवाहा जी, प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद.

chaatak के द्वारा
November 27, 2010

हरीश जी, संयुक्त परिवारों की बिलकुल सही विशेषताओं को आपने व्यक्त किया है| पारिवारिक विघटन भी सामाजिक विघटन का एक बहुत ही अहम् और बड़ा कारण है| यदि संयुक्त परिवार हमरे समाज में बना रहे तो काफी हद तक सामाजिक विघटन की स्थिति नहीं आती| मेरा मानना है कि ” किसी भी राजनीतिक लोकतंत्र को तभी सफलतम बनाया जा सकता है जब उसके समाज में पारिवारिक राजतन्त्र की बहुलता हो|” अच्छे लेख पर आपको कोटिशः बधाईयाँ !

    harishbhatt के द्वारा
    November 28, 2010

    चातक जी नमस्कार. आपने लेख को सराहा. और अपनी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दी. हार्दिक धन्यवाद.

nishamittal के द्वारा
November 27, 2010

भट्ट जी कुछ तो विवशता वश सयुंक्त परिवार टूट रहे हैं.कुछ हमारी मानसिकता घटिया हो गयी है.परन्तु यदि सयुंक्त परिवार में परस्पर तालमेल अच्छा है स्वर्ग नहीं तो बहुत कठिनाई रहती है नयी पीढी को.आज के जॉब कल्चर के कारण बड़ी पीढी का बड़े शहरों में समायोजन नहीं हो पाता बच्चे जॉब छोड़ वहां नहीं रह सकते..

    harishbhatt के द्वारा
    November 28, 2010

    आदरणीय निशा जी नमस्ते. आपकी प्रतिक्रिया हर बार मेरे लिए उत्साहजनक होती है. धन्यवाद.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 27, 2010

आदरनीय भट्ट साहब,वक्क्यी जब परिवार संयुक्त रूप से हुआ करते थे तो इतनी समस्याए मनुष्य को नहीं झेलनी पड़ती थी,एक साथ परिवार रहने का सबसे बड़ा लाभ तो ये है की बच्चों में अछे संस्कारों का विकास होता जो एकल परिवारों में थोडा मुश्किल ही नजर आता है,धन्यवाद!

    harishbhatt के द्वारा
    November 28, 2010

    आपको उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

Rajesh के द्वारा
November 27, 2010

सच बात है आज हम रोजगार की तलाश में संयुक्त परिवार से दूर होते जा रहे है. अच्छे लेख के लिए बधाई.

    neerja mishra के द्वारा
    November 27, 2010

    आप का लिखा आखिरी शब्द कि हम चाहते क्या है सब कुछ इसी पर निभर्र करता कि हमारी सोच क्या है। आज इस भागती दौड़ती जिन्दगी में हम परिवार से ज्यादा पैसे के पीछे भाग रहे है।


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