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Harish Bhatt

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आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है समाज

Posted On: 11 Dec, 2010 Others में

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बहुत कुछ करने की तमन्ना दिल में रखते है, पर क्या करें, कभी अपने मन का डर, कभी समाज की बंदिशे कदमों को रोक देती है। इतना तो जानते है कि जिंदगी मौत का दरिया है, और इस मौत के दरिया से होकर गुजरना ही है, लाख कोशिशे कर लें, इस दरिया में बहने से तो कोई रोक नहीं सकता है। हां इतनी बात समझ में आती है कि अगर अपने बाजुओं में ताकत और दिल में हौसला है, तो इस दरिया में बहादुरी के साथ तैर कर अपनी सुनिश्चित मंजिल पर पहुंचा जा सकता है, नहीं तो खुद को इस दरिया में बहने दो, कहीं न कहीं किनारा तो मिल ही जाएगा। सदियों से ऐसा ही होता आया है कि जिनके पास दृढ इच्छा शक्ति होती है वह अपनी मंजिल पर अवश्य ही पहुंचते है, भले ही उनके रास्ते में कितनी भी मुसीबतें आई हो, समाज की बंदिशे भी उनके बढते कदमों को नहीं रोक पाई। एक नहीं, हजारों-लाखों उदाहरण हमारे सामने मौजूद है, बिल्कुल निम्न स्तर से अपनी जिंदगी का सफर शुरू करने वालों ने समाज द्वारा स्थापित व मान्य बुलंदियों को छुआ है। और दूसरी ओर सितारों सी चमक बिखरेने वाले जमीं पर टूट कर बिखर गए। समझने वालों के लिए इशारा ही बहुत होता है, और न समझने वालों के लिए कुछ भी नहीं। यह हमारा समाज है कि जो हमारे लिए आगे बढने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है। अगर समाज का डर न हो तो इंसान इंसान नहीं रह सकता। हम तो खुद कैसे भी अपना जीवन बिता लेंगे। फिर जिंदगी के दरिया में कहीं न कहीं किनारे पर लग कर अपना जीवन व्यतीत कर ही लेंगे। अब क्योंकि हम इस समाज के महत्वपूर्ण अंश है, इसलिए हम हर पल समाज के आगोश में रहते है। समाज की बंदिशों का डर रहता है कि हम किसी भी काम को करने से पहले बहुत बार सोचने को मजबूर हो जाते है। अगर हमारी वजह से कोई गलत काम हो गया, तो कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेगे, फिर हमारे माता-पिता व हमारा परिवार समाज से कट भी सकता है और यही छोटी-छोटी बातें हमको कुछ सकारात्मक व सार्थक करने के लिए प्रेरित करती है। निम्न व मध्यम वर्गीय परिवारों की तरक्की के रास्ते समाज ही दिखाता है। जबकि उच्च वर्गीय परिवारों को समाज की कोई परवाह नहीं होती है, उनको लगता है कि वह समाज से ऊपर है। यह अलग बात है कि अपवाद हर जगह पर हो सकते हैं। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक के लंबे सफर में सबसे बेशकीमती युवावस्था का समय हमारी जिंदगी का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है, और इसी पडाव पर हमको बचपन की सुनहरों यादों के साथ सपनों को साकार करने प्रयास करना चाहिए, ताकि हम वृद्धावस्था में अपने समाज में गर्व से कह सके कि देखो और समझो हमने जिंदगी के दरिया में मजबूत व दृढ इच्छा-शक्ति के बल पर तैर कर अपने लिए वह मुकाम हासिल किए है, जो कामयाबी के शिखर बन गए। अगर हमने युवावस्था में समाज की परवाह नहीं की, तो ऐसा हो सकता है कि वृद्धावस्था में समाज हमारा साथ छोड दे और हम अकेले रह जाए, जिंदगी के आखिरी मोड पर। इसलिए जरूरी हो जाता है कि हमको अपना कल को संवारने के लिए आज समाज को सम्मान देकर और उससे प्रेरणा लेते हुए आगे बढने की कोशिश की जाए।

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Aira के द्वारा
October 17, 2016

Great post with lots of imonatrpt stuff.

Riya के द्वारा
November 20, 2012

nice written well done! :)

anamika के द्वारा
May 15, 2012

likha to acha hai lekin likhna khch chahte the likh kuch diya mera matlab ap samaj ke baare me achha bata rhe hai k uski buraiyo se awgat karwa rhe hai

jagdish r purohit के द्वारा
December 21, 2011

हमारी समाज तो हम सब के लिए एक अच्छा और साफ़ सुथरी जिन्दगी जीने का मुख्य आधार है ,अगर हम समाज को दरकिनार करेंगे तो हमारा जीवन एक नरक की तरह बन जाता है ,निजी जीवन जीने के लिए आज कल पैसा ही सब कुछ है ,पर समाज में भी रहना जरुरी है ,जीवन में आदमी महान कब होता है .इज्जत मान मर्यादा ,क्युकी हर आदमी का अपना परिवार होता है ,इसके लिए समाज बहुत जरुरी है ,समाजसेवक जगदीश आर राजपुरोहित जालोर

Sanjay के द्वारा
December 13, 2010

हरीश जी आपने सही ही कहा है कि अपना कल संवारने के लिए आज समाज को सम्मान देकर और उससे प्रेरणा लेते हुए आगे बढने की कोशिश की जाए

anil kushwaha के द्वारा
December 12, 2010

हरीश जी मैं हमेशा आपके लेख पढता हूँ. मैंने समाज की परवाह नहीं की इसलिए मैं तो कहूँगा की समाज की परवाह नहीं करनी चाहिए. क्योकि समाज आपके घर की रोटी नहीं चलता. आप अच्छा कर करेंगे तो ठीक है और कुछ गलत हो गया तो सबसे बुरे आप ही लगेंगे. मेरा मानना की समाज को हमने बनाया हैं न की समाज ने हमें. अगर आप सही कर कर रहे हैं तो समाज की चिंता नहीं करनी चाहिए.

    Harish Bhatt के द्वारा
    December 13, 2010

    कुशवाहा जी प्रणाम, आपकी बात भी सही है. पर जरुरी नहीं की समाज पूरी तरह से गलत हो, इसलिए हमको समाज के प्रति नाराजगी तो दिखानी चाहिए पर पूरी तरह से उससे अलग नहीं होना चाहिए. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

sdvajpayee के द्वारा
December 12, 2010

   हरीश जी, ”अगर हमने युवावस्था में समाज की परवाह नहीं की, तो ऐसा हो सकता है कि वृद्धावस्था में समाज हमारा साथ छोड दे और हम अकेले रह जाए, जिंदगी के आखिरी मोड पर। ”  उपयोगी लेख की ये लाइनें युवा वर्ग के लिए पाथेय का काम करेंगी। समाज की परवाह का अर्थ है संयम, अनुशासन और उत्‍तर दायित्‍व भाव। अगर हमें यह भाव बोध रहेगा कि हम स्‍वछंद नहीं हैं और समाज के प्रति हमारे अनिवार्य दायित्‍व भी हैं तो हम समाज की परवाह करेंगे ही।

    Harish Bhatt के द्वारा
    December 13, 2010

    आदरणीय वाजपेयी जी सादर प्रणाम, आपने लेख को सराहा, बहुत धन्यवाद. यह सच है अगर हम आज की किसी को सम्मान देगे. तभी कल उससे किसी बात की अपेक्षा कर सकते है.

Rajesh के द्वारा
December 12, 2010

हरीश जी बेहतरीन लेख के लिए हार्दिक बधाई

nishamittal के द्वारा
December 12, 2010

भट्टजी, समाज की न तो हम सर्वथा उपेक्षा कर सकते हैं न ही केवल समाज के भय से अपने (यदि हमारा अंतःकरण मानता है)उचित कार्य को छोड़ना चाहिए.आपका विवेक ही उचित मार्दर्शन कर सकता है.

    Harish Bhatt के द्वारा
    December 12, 2010

    आदरणीय निशा जी सस्दर प्रणाम, आपने लेख को सराहा. उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद.

ashutoshda के द्वारा
December 11, 2010

आदरणीय भट्ट साहेब आपने अपने पिछले ब्लाग में समाज को समाज की बातों को बेकार बताया था अब इस ब्लॉग में समाज की तरफदारी कर रहे है कृपया स्पस्ट करें की हम लोग समाज की माने या न माने ???? आशुतोष दा

    Harish Bhatt के द्वारा
    December 11, 2010

    आशुतोष जी प्रणाम. आपने बहुत ही सटीक सवाल उठाया है. हर चीज़ के दो पहलू होते है. मैंने पिछले ब्लॉग में समाज के एक पहलू पर लिखा था और इस ब्लॉग में दूसरे पहलू पर लिखने की कोशिश की है. अब यह हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम किस पहलू को अपनाते है. वैसे मेरी खुद की सोच में दोनों की अहमियत है. जरुरी नहीं की दोनों ही अच्छे हो. क्योकि कमी हरेक में होती है. हमको देखना है आखिर हम चाहते क्या है. आपने लेख पर प्रतिक्रिया दी बहुत-बहुत धन्यवाद.

    ashutoshda के द्वारा
    December 11, 2010

    भट्ट साहेब स्पष्टि करन देने के लिए धन्यवाद् बिलकुल ठीक कह रहे आप ये समाज एक उपवन है जिसमें काटें भी है और फूल भी अब ये हम पर हमारी क़ाबलियत पर निर्भर है की हम किसे चुनते है क्योंकि दोनों की पहचान करना भी उतना ही कठिन है आपके दोनों ही ब्लाग हमारे जीवन का आइना है आशा है आप ऐसे ही सभी ब्लागरों का मार्गदर्शन करतें रहेंगें आशुतोष दा


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