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गांधी के देश में अन्ना की आंधी - Jagran Junction Forum

Posted On: 22 Aug, 2011 में

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अब तक सिर्फ सुना या पढ़ा था कि गांधी जी थे, जिन्होंने अहिंसा के बल पर देश को स्वतंत्र कराया था और आज अन्ना हजारे ने अहिंसा की ताकत के दर्शन भी करवा दिए. पिछले कई दिनों से दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे अन्ना को जो समर्थन मिला, उसकी कल्पना गांधी जी के अनुयायियों ने कभी नहीं की थी. अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने में माहिर कांग्रेस ने आजादी से लेकर आज तक न जाने कितनी बार सत्ता का इस्तेमाल करते हुए लोकतंत्र का गला घोंट दिया. लेकिन आज अन्ना ने कांग्रेस को अहिंसा के बल पर ही घुटने टेकने को मजबूर कर दिया. आज बच्चा-बच्चा जान गया है अहिंसा की ताकत को, वरना उसको तो आज तक यही सिखाया गया कि झंडा उठाओ और निकल पड़ो नारे लगाते हुए और नतीजा सिफर. भले ही आजादी के बाद शुरूआती दौर में कांग्रेस ईमानदार रही हो, पर समय-समय के साथ-साथ उसके नेताओं की नीयत बदलती गई और देश भ्रष्टाचार के गर्त में डूबता चला गया. कहा जाता है कि एक न एक दिन तो पाप का घड़ा भर ही जाता है, ठीक वैसा ही आज हो रहा है. अन्ना की आवाज को आनन-फानन में दबाने के प्रयास में अन्ना को जेल में डालकर कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली. अन्ना की हिम्मत से देशवासियों का जमीर जाग गया. आज हालात यह है कि देश के कोने-कोने से अन्ना के समर्थन में आवाज निकलने लगी है. यह आवाजें आवाज नहीं हुंकार बन गई है. एक सच यह भी है कि भले ही किसी को पता न हो लोकपाल बिल क्या है, उसके कानून बन जाने पर क्या फायदे-नुकसान होंगे. भ्रष्टाचार कितना दूर होगा, नहीं मालूम. लेकिन भारतवासियों की उम्मीद बन चुके अन्ना पर उसका पूरा भरोसा है, वह जान रहा है कि अन्ना भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जो कर रहे है, वह बिलकुल सही है, इसलिए वह अपने व्यस्त समय में समय निकाल कर अन्ना की आवाज को बुलंद बनाने के लिए सडक़ों पर उतर रहा है. हर कोई अपनी हैसियत के अनुसार आंदोलन में भागीदारी कर रहा है, बच्चे पूरे दिन क्लास में पढऩे के बाद रैलियां निकाल रहे है तो बड़े शाम के समय कैंडिल मार्च, कोई गांधी टोपी लगाए ही घूम रहा है तो कोई अपना सिर मुंडवाए बैठा है. हर ओर विश्व विजयी प्यारा तिरंगा दिखाई दे रहा है, जो आज तक सिर्फ २६ जनवरी या १५ अगस्त को ही बक्सों से बाहर निकल पाता है, वह आज सबकी शान बन चुका है. इस सबके बीच एक ही बात सबसे महत्वपूर्ण है कि न कोई हिंसा, न कोई फिजूल की मारमारी, लेकिन फिर भी क्रांति की शुरूआत हो गई. यही तो है अहिंसा की ताकत. कितना अच्छा सा लग रहा है कि वक्त ने ली करवट और धीरे से आ गई गांधी के देश में अन्ना की आंधी.

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rajinder prasad के द्वारा
September 14, 2011

देश के लिए संभालने का समय, झकझोरने की बेला भ्रष्टाचार को लेकर पिछले दिनों काफी उथल-पुथल दिखाई दी. सरकार और राजनीतिक दल ऊहापोह में नज़र आये. जिन लोगों ने आपातकाल के समय ‘जयप्रकाश आन्दोलन’ को नहीं देखा, उन्होंने उसी तरह के ‘अन्ना हजारे’ के आन्दोलन को देखा. काफी समय से यह अनुभव हो रहा था कि इस देश में गलत कामों को रोकने वाला कोई नहीं है और न ही भ्रष्टाचार और कदाचार को लेकर राष्ट्रीय बहस या आन्दोलन शायद ही खड़ा करने का साहस कोई करे. अन्ना हजारे ने इस मिथक को तोड़ने का गंभीर और आशाजनक साहस किया गांधीगिरी के सहारे. आन्दोलन खड़ा करने की कोशिश बाबा रामदेव ने भी की, लेकिन उनके आन्दोलन को पंचर कर दिया सरकार की चतुराई ने. कोशिश तो अन्ना हजारे को भी आन्दोलन से बेदखल करने की रही, लेकिन उनकी रणनीति के आगे सत्ता के रणनीतिकारों की बिसात जम नहीं पाई. उडती चिड़िया को पहचाननेवाले नेता जनता का आक्रोश नहीं समझ पाए, लेकिन जनता ये समझाने में कामयाब हुई कि जन-प्रतातिनिधियों को जनता के प्रतिनिधि होने के नाते उनको जो आवाज समझ नहीं आई, उसको अन्ना ने समझा दिया, उन्ही की भाषा में. कहा जाता है की कोई भी आन्दोलन तभी सफल होता है, जब युवाशक्ति उसके लिए खड़ी हो जाती है. अन्ना के अनशन से जुड़े सवालों से कारवां बढता गया और आमजन जुड़ता गया और युवाओं ने सबसे ज्यादा भागीदारी निभाकर दिखा दिया कि अगर मशाल सही हाथों में हो तो आन्दोलन की सफलता पर कोई संदेह नहीं हो सकता. सरकार पहली बार कदम दर कदम, मोके-बे-मोके बदलती देखी गयी. सत्ता जिन लोगों के हाथ में थी, जनता महसूस कर रही थी कि वे सख्ती से जनता की आवाज़ बंद करने के मंसूबे पाले हुए थे और दूसरी तरफ जनता जबरन उनको अपनी आवाज़ सुनाना चाहती थी. अन्ना दल की सदारत में जनता अपनी आवाज संसद तक पहुँचाने में कामयाब हुई. भ्रष्टाचार, बेकाबू महंगाई, घोटाला संस्कृति, रिश्वतखोरी आदि को ब्रेक लगाने में देश के अनेक दलों की सत्ताएं आयीं, लेकिन नाकाम रही. उनके भीतर इन समस्याओं से लड़ने का जनून और जज्बा दिखाई नहीं दिया. यह अलग बात है कि कुछ लोगों में अपने मंसूबे के मुताबिक सत्ता के नाम पर धन एकता करने का जज्बा जरूर दिखाई दिया और उन्होंने इस मामले में आशातीत सफलता भी पायी. कुछ जिम्मेदार लोग व्यवस्था के नाम पर थोड़े-बहुत जूझे, पर उनके प्रयास ऊंट के मुहँ में जीरा साबित हुए. देश की जनता के सामने खलबली मचानेवाला यक्ष प्रश्न यह है कि जो लोग देश चलने या राजनीति करने का दंभ भरते हैं, वे इन समस्याओं के सामने लाचार और नतमस्तक क्यों हैं? संसद में चर्चा के दौरान कुछ सिरफिरी सोचवाले लोगों ने आन्दोलन के रहनुमाई करनेवाले लोगों के प्रतिनिधित्व पर सवाल खड़े करते हुए बेशर्मीभरे लहजे में कहा कि ये लोग जनप्रतिनिधि नहीं हैं, पर उनसे कोई सवाल पूछे कि वे जनप्रतिनिधि होने का दंभ भरते हैं, तो जनता की आवाज क्यों नहीं सुन पाए? दरअसल वे आवाज इसलिए नहीं सुनते कि ऐसी आवाज उनके हितों के खिलाफ है? भ्रष्टाचार का आलम अगर उन्हें राजनीति में दिखाई नहीं देता या वे उसपर अंकुश लगाने के लिए उदासीनता बरतते हैं तो या तो वे लाचार और बेबस हैं या फिर उससे उनका पोषण हो रहा है. ऐसे लोग देश को क्या दिशा दे पाएंगे, यह सब जनता के सामने है? ऊपर से संसद की गरिमा को ठेस पहुँचाने के लिए जनता के आन्दोलन को दोषी बताते हैं. क्या ऐसे लोगों ने अपने गिरेबान में झाँका है कि ऐसे लोगों ने खुद संसद कि गरिमा देश के सामने स्थापित करने के लिए कितना योगदान दिया है? संसद में गरिमा तार-तार होते देखने में या तार-तार करनेवालों के खिलाफ बहुत ही कम लोग उसको बचाने में सामने आये हैं, जो निस्संदेह सम्मान के पात्र है. लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को देश के हितों के खिलाफ काम करने की छूट नहीं दी जा सकती और न ही जनता जिन बातों को लेकर परेशान है, उनकी अनदेखी करके अपने हित साधने का अवसर देती है! सवाल ये है कि राजनीति में कितने लोग हैं जो गलत काम करने वालों के खिलाफ अलख जागते हैं या ऐसे लोगों को शरण नहीं देते? देश को बाहरी दुश्मनों से इतना खतरा नहीं है जितना हमारे देश के भीतर मिलीभगत का अजीब खेल आज हमारे देश की शासन व्यवस्था में चल रहा है. धनबल और बाहुबल के बीच अलिखित समझोता हो गया है, जिसका परिणाम देश और ईमानदार जनता को भुगतना पड़ रहा है. अब जागने का समय है, ललकार का वक्त है, झकझोरने की बेला दरवाजे पर दस्तक दे रही है, देश के लिए कुछ काम करने की चुनौती हमारे सामने है, हम उसके लिए कितना सुनते हैं, योगदान देते है, या इसके विपरीत जगानेवालों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं? क्यूंकि अन्ना दल और बाबा रामदेव के खिलाफ दर्ज होते मामले ऐसी ही याद दिला रहे हैं. अब देश के अस्तित्व की रखवाली का भार हमारे कंधो पर है कि क्या आज़ादी के लडाई में अपने प्राणों के आहुति देने वाले हमारे पुरखों की आवाज़ के साथ हम खिलवाड़ होने देंगे, जिन्होंने विदेशी हुकूमत की जंजीरों को तोड़कर हमारे देश और समाज के लिए सपने संजोये थे? हमारे सामने परिवर्तन की ललकार है, बदलाव के आंधी है, अगर हम उसकी आवाज़ को नहीं सुनेंगे तो हमें देश, समाज और आनेवाली पीदियाँ कभी नहीं बख्शेंगी. हमें अपने गिरते मूल्यों को बचाना होगा, तभी हम बचेंगे, समाज बचेगा, देश बचेगा और आनेवाली पीदियों को कुछ अच्छी विरासत सोंप पाएंगे. Rajendra Prasad, Mehrouli, नई दिल्ली, rpvats2@gmail.com

अभिषेक दत्त चतुर्वेदी के द्वारा
August 23, 2011

आज कल हमारे देश में एक नयी लहर चल रही है उसको देख कर अच्छा लगता है की हिंदुस्तान में लोग अब चाहते है की बेईमानी समाप्त हो, ये अच्छी बात है और हो भी क्यूँ नहीं आखिर आज हमारा देश अगर किसी वजह से पीछे हे तो उसका कारण सिर्फ लोगो के अन्दर जो बेईमानी है वो ही उसका मुख्य कारण है| आज हर कोई बोलता है की सरकार को अन्ना हजारे की बात मान लेना चाहिए और सालों से फाइल में बंद ” जन लोकपाल विधेयक ” को अमल में लाना चाहिए| मेरी अपनी राय है की इस देश में अच्छे कानूनों की कमी नहीं है, कमी है हमारी जो हम उसको सही से अमल नहीं करते, क्या ” जन लोकपाल विधेयक ” पास हो जाने से देश से बेईमानी समाप्त हो जाएगी? मुझे नहीं लगता की ऐसा हो सकता हे? क्या कमी थी मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद में पर जब उस पद पर ही एक ऐसा आदमी हो जो खुद ही दोषी हो तो उससे ये उम्मीद कैसे की जाएगी की वो और लोगो को रही राह दिखा सकेगा, जरुरत किसी कानून की नहीं जरुरत है हमको खुद को बदलने की, जरुरत है हमारी सोच को बदलने की, आज अन्ना हजारे के साथ देश की १२० करोड़ की आबादी में से कम से कम १२ करोड़ लोग तो साथ है, और चाहते है की देश से बेईमानी का रोग समाप्त हो जाये, तो उसको लिए उनको न किसी जन लोकपाल की जरुरत है न किसी अन्य पद की जो देश से बेईमानी को हटाने के लिए बनाया जाये, अगर देश के १२ करोड़ लोग ने ये सोच लिया, तो तो खुद बेईमानी करना है ना बेईमानी करने वाले का साथ ही देना है तो अंदाज़ लगाइए इसका असर कितने लोगो पर होगा, अगर अन्ना हजारे की आवाज़ में आवाज़ मिलाने वाले लोग खुद ईमानदारी का रास्ता अपनालेंगे तो खुद इस देश से बेईमानी नहीं बचेगी क्यूनी हर आदमी कम से कम ५ आदमी को बदल सकता हे तो इस तरीके से ६० करोड़ लोग ईमानदारी के रस्ते पर चलेंगे तो बाकी के लोग अपने आप उसी रास्ते पर जायेंगे जिस पर बहुमत चल रहा है, आज हमारी सोच ये हो गयी है की दुसरे लोग जो बेईमानी करते है वो गलत है पर में जो करता हू वो बेईमानी नहीं है, नहीं बेईमानी बेईमानी ही हे चाहे आप छोटा करे या बड़ा, अगर हमको हमको मौका मिलेगा तो हम १ रूपया बचाने के लिए डी. टी. सी. की बस में कोशिश करेंगे की या तो टिकिट ही ना ले या एक स्टॉप के बाद अगर ८ रुपये की जगह ६ रुपये का टिकिट लगता है तो ६ का टिकिट ले, क्यूँ ? क्या ये बेईमानी नहीं है? क्या अन्ना हजारे के साथ ईमानदारी की वकालत करने वाले लोग ये कह सकते हे की आज तक उन्होंने आज तक कोई बेईमानी नहीं किया, मुझे नहीं लगता की जितने लोग अन्ना हजारे के साथ हे उसका १% भी ऐसे होंगे, अपनी खुद की तो मैं ये बोल सकता हूँ की कई बार पहले से ट्रेन टिकिट नहीं होने के कारण बिना टिकिट ही ट्रेन में सफ़र किया या अन्दर टी. टी. से बोल कर या कुछ ले दे कर जहाँ तक जाना था चले गए, अब ये भी बेईमानी ही है, सिग्नल तोडा और अगर पुलिस का आदमी ने पकड़ा तो हम अपनी तरफ से तुरंत ही अपना चालान कटवाने की जगह कुछ देकर ही मामला ख़त्म करने की कोशिश करते है, क्या ये बेईमानी नहीं है? आज नए भारत के युवा बहुत आगे हे इस मुहीम में की देश में से बेईमानी मिटे, पर अपने परीक्षा के समय ज्यादातर या तो किस प्रोफ़ेसर ने पेपर बनाया है उससे पेपर पता करने में लगते है ये पेपर के बाद कैसे नंबर ज्यादा लाये जाये वो पता करने में, क्या ये बेईमानी नहीं है? हमारे पास खाने के लिए नहीं है इसलिए हम ये बोले की हम व्रत कर रहे है ये सही नहीं है, व्रत तब होता है जब हम खा सकते है और इसलिए नहीं खा रहे की हमारा व्रत है, तो अगर बेईमानी करने का मोका नहीं मिला इसलिए आप नहीं कर पाए तो आप अपने को ईमानदार बोलते है तो सही नहीं है, आप ईमानदार तब है जब आपको मोका मिला और आपने बेईमानी नहीं किया, आज जरुरत ना तो किसी जन लोकपाल की है ना किसी और की जरुरत है अपने आप को और अपनी सोच को बदलने की, आज जरुरत है श्री राम शर्मा “गायत्री तपोभूमि” के उस बात को अपनाये ” हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, हम बदलेंगे युग बदलेगा” आज अगर अन्ना हजारे के साथ खड़े लोग ही ये शपथ ले ले की ना तो बेईमानी करेंगे ना बेईमानी सहेंगे, तो बेईमानी अपने आप इस देश से भाग जाएगी, हमको इसके लिए किसी जन लोकपाल की जरुरत नहीं, कोई जन लोकपाल हमारे अन्दर की बेईमानी को नहीं मिटा सकता उसको सिर्फ हम खुद मिटा सकते है. इसलिए खुद को जन लोकपाल बनाने की जरुरत है, किसी और को नहीं. अभिषेक दत्त चतुर्वेदी दुबई – सयुक्त अरब अमीरात


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