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Harish Bhatt

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उम्मीद

Posted On: 24 Aug, 2011 में

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काली स्याह रात को
नई सुबह के इंतजार में
गुजरते देखा है
एक मामूली से शख्स को
लोगों की उम्मीदें बनते देखा है
साथ ही देखा है
हर दिन को ढलते हुए
रात के करीब जाने के लिए
और देखा है
लोगों की उम्मीदों को टूटते हुए
अब तो समझ भी आता है
क्यों टूटती है उम्मीदें
क्योंकि हमको नहीं होता
खुद पर भरोसा
इसलिए टूटती है उम्मीदें
ढलता है दिन
और आ जाती है काली स्याह रात

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Eddi के द्वारा
October 17, 2016

That ins’ghtis just what I’ve been looking for. Thanks!

kiranarya के द्वारा
December 20, 2011

हरीश जी नमस्कार मैं उम्मीद को कुछ इस तरह देखती हूँ……… उम्मीद जीने का सहारा है, काली रात में चाँद का उजियारा है, हा कभी डगमगा भी जाती है उम्मीद, जीवन में काले बादलो सी छा जाती है, इक पल चेहरे पे गम की बदली सी छा जाती है उम्मीद, संभलकर और निकलकर काले स्याह अंधियारे से, अगले ही पल एक नई आस लिए मुस्कुराती है उम्मीद, ऐसे ही नहीं कहते की उम्मीद पे दुनिया कायम है, यह ना हो तो सोच की सकारात्मकता हो जाए ग़ुम, काली स्याह रात के बाद सूरज की लालिमा सी दमकती है, इसीलिए तो इस संग रहकर जिंदगी हर दम हंसती है………..किरण आर्य

    Fidelia के द्वारा
    October 17, 2016

    Shiver me timbers, them’s some great intromafion.

Ashok के द्वारा
August 24, 2011

उम्मीदों से ही जीते हैं, उम्मीदों से ही सच होते हैं  सपने. कहीं कोई गम  आ भी जाये तो, आस जगाती हैं उम्मीदें. be possitive harishji.

nishamittal के द्वारा
August 24, 2011

हरीश जी बहुत दिन बाद आपकी रचना पढ़ रही हूँ परन्तु इतनी निराशा ?


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