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Harish Bhatt

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पढ़कर कोई कलेक्टर तो बनना नहीं

Posted On: 7 Sep, 2011 Others में

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कम्प्यूटर के दौर में हम जितनी तेजी से आगे बढ़ते जा रहे है, उतनी ही तेजी से हमारी शिक्षा के पारंपरिक तौर-तरीके व साधन हमसे दूर होते जा रहे है. बचपन में सरकंडे या बांस की एक पोर के लिए दिन भर भटकने या लाला की दुकान से 10 पैसे की एक पोर और 5 पैसे में स्याही की टिकिया खरीद लाने के बाद पहले कलम बनाने और स्याही की टिकिया को घोल कर कुछ नया करने की लालसा मन में जागती थी, वह आजकल कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर कहां. पहले पेंसिल-कॉपी, स्लेट-बत्ती पर लिखते-लिखते जरूरी हो जाता था कि तख्ती पर लिखना, ताकि लेखन में सुधार हो, क्योंकि आपके लेखन से आपका व्यक्तित्व झलकता है. तख्ती पर लिखना और फिर उसको मिटाने के लिए चिकनी मिट्टी की जरूरत से अहसास होता था कि जिंदगी में कुछ कर गुजरने के लिए मेहनत बहुत जरूरी हो जाती है. लेकिन आजकल ऐसी चीजों की आवश्यकता ही नहीं होती, फिर लिखने के लिए आपके पास पेन के अलावा कम्प्यूटर जो उपलब्ध होता है और जब अपनी इच्छा पलक झपकते ही पूरी हो, तो मेहनत की क्या जरूरत. स्कूल के समय की एक और बात याद आती है, पहाड़े याद करना, जो आजकल शायद ही किसी बच्चे को सिखाए जाते हो. पहले गुणा-भाग करना हो, जोड़-घटाव, बगैर पहाड़े याद किए बिना गणित का कोई सवाल हल करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा था. जिसने पहाड़े याद किए मान लीजिए, वह खुद कम्प्यूटर हो गया. लेकिन आजकल बच्चों के दिमाग पर पहाड़ों की जगह कैलकुलेटर ने अपना कब्जा जमा लिया है, जरा भी गणितीय सवालों को हल करना हो, तो कैलकुलैटर हाजिर है, जो कम्प्यूटर के साथ-साथ मोबाइल में भी मौजूद रहता है. अब खुद ही सोचिए हमने क्या किया, सभी कामों को करने के लिए जब हमारे सामने हर संसाधन उपलब्ध है, तो हम आलसी क्यों नहीं होंगे. अब न किसी को सरकंडे की पोर की जरूरत है और न ही स्याही टिकिया घोलने में समय लगाना पड़ता है. इसके साथ ही पहाड़ों को याद करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. इन सबके परिणामस्वरूप दिमागी कसरत की तो बात ही भूल जाइए. जब दिमाग के पास कुछ करने के लिए बचा ही नहीं तो वह कही तो अपना समय लगाएगा ही, फिर चाहे खुराफत ही सही. और अब तो शिक्षा प्रणाली को इतना आसान बनाया जा रहा है कि फेल होने की गुजांइश ही नहीं बचती. पहले कम से कम फेल होने के डर से बच्चों में थोड़ा बहुत पढऩे की मजबूरी तो होती ही थी, लेकिन अब जब फेल ही नहीं होना तो क्या करना अपना दिमाग खराब करके. वैसे भी पढ़कर कोई कलेक्टर तो बनना नहीं है. अब तो सब कुछ पता है, इस देश में कैसे बहुत कम पढ़े-लिखे ज्यादा पढ़े-लिखों पर राज करते है. फिर हमको तो राज करना है, ना की किसी की चाकरी. कुल बात यह है कि हम अपनी पुरानी शिक्षा प्रणाली को दरकिनार करते हुए कैसे दावा करते है कि हम सबसे बेहतर होने की दिशा में प्रयास कर रहे है. नए अविष्कारों को महत्व मिलना चाहिए, लेकिन इतना भी नहीं कि उसको अपनाने की धुन में अपनी परम्पराएं और अपना अस्तित्व ही गुम हो जाएं.

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
September 8, 2011

हरीश जी ,.नमस्कार बहुत सार्थक लेख के लिए साधुवाद ,….तकनीक का अंधाधुंध प्रयोग कहीं हमारे भविष्य को स्याह तो नहीं कर रहा है ,…..पहले हमें सभी परिचितों के फोन न. याद रहते थे अब तो घर के सभी सदस्यों के भी नहीं ,…कहीं कोई शोध पढ़ा था ….तकनीक के ज्यादा इस्तेमाल से हमारी याददाश्त लगातार कमजोर हो रही है

    Harish Bhatt के द्वारा
    September 8, 2011

    संतोष जी सादर प्रणाम. ये सही बात है कि तकनीक के ज्यादा इस्तेमाल से हमारी याददाश्त लगातार कमजोर हो रही है. लेख पर प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 8, 2011

    हरीश भाई जी ,..ये प्रणाम करके शर्मिंदा ना करे तो बड़ी कृपा होगी ,..सादर धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
September 8, 2011

बिलकुल सही कहा हरीश जी,आपने आधुनिकता समय के साथ आवश्यक है,परन्तु मौलिकता की कीमत पर नहीं.

    Harish Bhatt के द्वारा
    September 8, 2011

    आदरणीय निशा जी सादर प्रणाम. लेख पर सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
September 7, 2011

हरीश जी, बिलकुल सही कहा आपने। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान तो ठीक है मगर परम्पराओं को नहीं भूलना चाहिए। दुकान पर सामान लेने जाओ तो दुकानदार १२ रुपये और ८ रुपये को भी कैलकुलेटर से जोड़ता है। मैंने एक से पूछ लिया तो कहने लगा कि क्या करें भईया.. आदत हो गयी है। ये आदत बदलनी चाहिए। आभार,

    Harish Bhatt के द्वारा
    September 7, 2011

    वाहिद जी सादर प्रणाम, लेख पर सकरात्मक्ल प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

bharodiya के द्वारा
September 7, 2011

हरिश्भाई हम व्यक्ति है । हमारा ज्ञान, हमारी सोच शिक्षणशास्त्रीयो के आगे छोटी होती है । हजारो शिक्षणशास्त्रीयों ने मिल के सोचा होगा की कौन सी पढाई को महत्व देना है । शायद वो जमाने के साथ चलना सीख गये है । हम है की हमे सब पूरानी चीजें ही अच्छी लगती है ।

    Harish Bhatt के द्वारा
    September 7, 2011

    भरोदिया जी नमसते. प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. आपको भी आज नहीं तो कल मानना ही होगा की आज की शिक्षा प्रणाली हमारे बच्चो को किस दिशा में ले जा रही है. सच कहिये क्या आपको अंतर नहीं मालुम चल रहा है. पुराना अच्छा था या नया अच्छा है.

Amar Singh के द्वारा
September 7, 2011

आजकल नयी तकनिकी जिस प्रकार लोगो पर हावी है और वह अपने छोटे छोटे कार्य भी तकनीक के सहारे करने लगे है वो दिन दूर नहीं जब बच्चे २ का टेबल भी कंप्यूटर के सहारे पद पायेंगे. आज कल के बच्चो में तो शब्दकोष में शब्द ढूँढने का धेर्य नहीं है, कंप्यूटर में मिनटों में हर चीज उपलब्ध है.

    SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
    September 7, 2011

    हरीश जी. आपने अपने ब्लॉग में .शिक्षा की वर्तमान स्तिथि का सुन्दर आंकलन किया है.

    Harish Bhatt के द्वारा
    September 7, 2011

    aadrniya agarwal ji saadar pranaam. aapne lekh par sakaramtak प्रतिक्रिया दी. बहुत बहुत धन्यवाद.

    Harish Bhatt के द्वारा
    September 7, 2011

    अमर जी नमस्ते. सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.


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