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Harish Bhatt

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हम बेघर भले

Posted On: 5 Jan, 2012 में

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कौन कहता है जन्नत इसे,
हम से पूछो जो घर में फंसे।
न हिफाजत, न इज्जत मिली,
कर- कर कुर्बानी हम मर गए।
दुश्मनों की जरूरत किसे,
जुल्म अपनों ने ही हम पे किए।
हमने हर शै संवारी मगर,
खुद हम बदरंग होते गए।
अपने हाथों बनाया जिन्हें,
हाथ उनके ही हम पर उठे।
घर के अंदर भी गर मिटना है,
तो संभालों ये घर, हम चले।
जिसमें दिन-रात हम जले,
ऐसे घर से हम बेघर भले।
कौन कहता है जन्नत इसे,
हम से पूछो जो घर में फंसे।

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surabhi के द्वारा
September 2, 2014

Bahut badhiya

surabhi के द्वारा
September 2, 2014

V नीस

dineshaastik के द्वारा
January 8, 2012

ऐसे घर से हम बेघर भले मार्मिक चित्रण, बधाई……….

Deepak Sahu के द्वारा
January 7, 2012

हरीश जी! सुंदर पंक्तियाँ आपकी! बधाई

nishamittal के द्वारा
January 6, 2012

भट्ट जी,गहन अर्थों को समेटे सुन्दर रचना पर बधाई.

आर.एन. शाही के द्वारा
January 6, 2012

बड़ा दर्द है हरीश जी, किसी समय हूक सी उठी होगी आपके दिल में, जो उछल कर काग़ज़ पर छितरा गई है । अपने-अपने संदर्भों में इन पंक्तियों के हज़ारों अर्थ निकलते हैं, और शायद यही विशेषता काव्य को गद्य से अधिक महत्व प्रदान करती है । साभार !

aapka apana dost के द्वारा
January 6, 2012

kya baat he bhatt ji


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