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Harish Bhatt

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चांद और झूठ

Posted On: 5 Apr, 2012 में

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यह क्या
ऐसा तो न सोचा था
यह तो धोखा हो गया
बच्चा समझ के बहलाया नानी ने
दूर एक ग्रह को बनाया था मामा
रोज रात में बताती थी मुझे
देखो आसमां में जो चमक रहा है
वह हैं सबका प्यारा चंदामामा
धीरे-धीरे अक्ल आने लगी
नानी का झूठ समझ आने लगा
क्यों बोला झूठ उन्होंने
बच्चा जान बहलाया मुझे
लेकिन कहते है
प्यार में होता है सब जायज
यह बात भी समझ आती है
जब बचाना होता है गृह अपना
तब लेता हूं झूठ का सहारा
और कहता हूं अपनी प्रेयसी से
चांद जैसे मुखडे़ पर
बिंदिया है तेरी सितारा
वह भी जानती है और मैं भी
पर क्या जाता है प्यार में
अगर कोई रूठा मान जाए
जैसे नानी कराती थी चुप मुझे
वैसे ही मनाता हूं अपनी प्रेयसी को
लेकर झूठ का सहारा
यह क्या
धोखा खाकर धोखा दे रहा
ऐसा न तो सोचा था मैंने

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Noopur के द्वारा
November 6, 2014

bahut barhiya harish ji, kabhi kabhi apnon के chehre par hansi lane के लिए झूट bolna parta h, magar वो ghoot jisse usko aage jakar koi nuksan na ho. kabhi bat टालने के लिए झूट बोलते है वो ठीक नहीं है

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 6, 2012

आदरणीय हरीश जी, आपकी कविता पढ़ कर बहुत अच्छा लगा |  बहुत ही सरल शब्दों में अपनी भावों को पिरोया है आप ने अति सुन्दर |

Kuldeep Singh Bais के द्वारा
June 14, 2012

pyaar me kya sach kya jhooth

Mohinder Kumar के द्वारा
April 24, 2012

हरीश जी, नानी की कहानी और सांईस के सच का बहुत बढिया मिश्रण किया है आपने अपनी इस रचना में. पर उस कहानी में जितना रस और चुम्बकीय प्रभाव था वो सत्य में कहां है.

yamunapathak के द्वारा
April 7, 2012

kabhee-kabhee is jhuth se bhee zindgee tanaavon se bachee rahtee hai, pathar mein bhee to khudaa dekh lete hain sab.

Ankur के द्वारा
April 6, 2012

हरीश जी, अतिउत्तम रचना, बधाई.. मेरे ब्लॉग पर आया कीजिये. http://www.hnif.jagranjunction.com

sanjay dixit के द्वारा
April 6, 2012

बहुत सुन्दर हरीश जी

    Ram के द्वारा
    May 14, 2012

    मुझको यकी है जो कहती थी , सच ही अम्मी कहती थी जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद पे परिया रहती थी ।


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