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Harish Bhatt

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मैं रह गया अकेला

Posted On: 1 Nov, 2012 में

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मैंने समझा जिसको अपना,
निकला वो बेगाना।
जिंदगी के सफर पर
अकेला ही चलना पड़ रहा है,
दिल में उसकी यादें लिए,
जिसको निभाना था साथ मेरा
हर बात का होती है एक वजह
बेवजह नहीं होती कोई बात
बस यही बात सोचता हूं जब
तब याद आती है पुरानी बातें
कभी अपने अहम के कारण
नहीं दिया था उसको मान
जरूरत थी जब उसको मेरी
प्रकृति का नियम है परिवर्तन
समय के साथ बदली परिस्थितियां
सोच बदली और इतनी बदली
कि वो भी बदल गया
उसको भी मिल गया सहारा
और फिर मैं रह गया अकेला
अब समझ में आता है
अब किसको दूं दोष
कभी मैंने न समझा उसको
और कभी उसने न समझा मुझे
बस अब यूं ही चला जा रहा हूं
तन्हा, अकेला, जिंदगी के रास्ते पर

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajiv Singh के द्वारा
July 28, 2014

bahut achchha hai sir ji baat sahi kaha aapne,

Shobha के द्वारा
June 7, 2014

कविता के भावो में बहुत दर्द है अच्छी कविता शोभा

bdsingh के द्वारा
July 21, 2013

दर्द  और  पस्चाताप  अच्छी  अभिव्यक्ति                                                                    बी.डी.सिंह समाजिक वेदना                                                                                                                                                                                           

harirawat के द्वारा
June 22, 2013

हरीश भट्ट जी सुन्दर कविता है ! बधाई ! जागते रहो पर आकर जरा लोगों को जगा दो ! हरेन्द्र रावत

Santlal Karun के द्वारा
November 6, 2012

अपील करती अच्छी रचना; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “बस यही बात सोचता हूं जब तब याद आती है पुरानी बातें कभी अपने अहम के कारण नहीं दिया था उसको मान जरूरत थी जब उसको मेरी”

    Sushma Gupta के द्वारा
    November 12, 2012

    हरीश जी ,प्रथम तो आपको दीपाबली के पावन – पर्व पर हार्दिक शुभ-कामनाएं ‘| आपकी रचना अति मार्मिक एवं ह्रदय को प्रभाबित करने बालीसुन्दर प्रस्तुति , है,इस हेतु वधाई … सुषमा गुप्ता


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