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Harish Bhatt

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वो और एक नजर

Posted On: 29 Nov, 2012 में

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आते-जाते
रास्तों पर मिलते थे वो
मिलना भी क्या
नजरों से मिलती थी नजर
बस यूं ही सिलसिला चलता रहा
एक दिन नहीं, दो दिन नहीं
सालों- सालों तक ऐसा ही चला
उनका आना, नजरे झुका कर जाना
ऐसे ही एक दिन मिले वो
उन्होंने हिला दिए लब अपने
और
मुझे लगा उन्होंने कुछ कहा
उनका कुछ कहना या न कहना
मेरा कुछ समझना या न समझना
उनके आने से पहले ही
मेरा वहां पहुंचना
होने लगा मेरे लिए जरूरी
एक नजर भर देखने के लिए
चौबीस घंटे का इंतजार खलने लगा
एक नजर के चक्कर में
छूट गया सब कुछ
दिन-रात बैचेनी होती थी
इस बैचेनी में न मिली कामयाबी
हुआ यूं कि
न मैंने उन्हें कुछ कहा
न उन्होंने कुछ कहा मुझे
बस यूं ही अनजाने में
समय गुजर गया अपना
अब क्या
न वो मिलते है रास्ते में
न ही इच्छा होती कुछ करने की
बस यूं ही चल रहा हूं जीवन पथ पर

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anjali Vyas के द्वारा
March 2, 2014

yaado ki hkikt hi byan kr di aapne to

vjpr1 के द्वारा
September 6, 2013

बहुत खूब बधाई

graceluv के द्वारा
March 11, 2013

Hello Dear! My name is Grace, I saw your profile and would like to get in touch with you If you’re interested in me too then please send me a message as quickly as possible. (gracevaye22@hotmail.com) Greetings Grace

yatindrapandey के द्वारा
January 21, 2013

दिल की तिश्नगी को आप अच्छे से समझते है. ये कविता बहुत सुन्दर है मेरे दिल को छूती है

Sushma Gupta के द्वारा
December 18, 2012

भट्ट जी , आपकी रचना जीवन के उन अनजान मुसाफिरों की सुन्दर अभिव्यक्ति है ,जो जीवन में याद बनकर छाए रहते हैं … बहुत आभार सहित …मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत …

    उदय कुमार के द्वारा
    January 12, 2013

    यही हो ता है जिंदगि के अनजान राहो मे ……………………… कैसे कह दू की मुलाकात नहीं होती है मुलाकात तो रोज होती है पर बात नहीं होती है


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