Harish Bhatt

Just another weblog

320 Posts

1687 comments

Harish Bhatt

Layout Artist- Inext

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2899 postid : 832

हम भी जिद के पक्के है

Posted On: 24 Dec, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

क्या बात करें किससे बात करें
जब किसी ने सुनना ही नहीं है तो
कितना भी विरोध प्रदर्शन कर लो,
कुछ नहीं होने वाला लेकिन
इतना तो जानते ही है
वक्त किसी का नहीं होता.
आज उनका तो कल हमारा
कर लीजिये कितने भी जुल्म।
अभी वक्त तुम्हारा है।
हम भी जिद के पक्के है,
इस गुस्से को शांत नहीं होने देंगे।
भरोसा है अपने पर, बदलेगा वक्त जरुर
आज नहीं तो कल, जवाब तो देना होगा
अभी तो यह आगाज़ है, अंजाम बाकी है
कदम अब उठ चुके मंजिल की ओर
नहीं रुकेगे किसी के रोकने से
हर जुल्म का हिसाब लेगें हम
अब नहीं होने देंगे मनमानी
क्योंकि अब हम भी जागे है
हम भी जिद के पक्के है,
इस गुस्से को शांत नहीं होने देंगे।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (23 votes, average: 3.48 out of 5)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

neeru के द्वारा
April 27, 2015

बहुत अच्छा

Anjali Vyas के द्वारा
March 2, 2014

aaj k mahol pr khri utrti hai aapki abhivyakti

deepakbijnory के द्वारा
August 17, 2013

वाह वाह aadarniya हरीश ji सुंदर rahna 

rekha dubey के द्वारा
March 9, 2013

क्यो मेरे मुखरित स्वर कलम बद्दू ना हो पायेगे| आशाओ के दीप जलाओ अंधकार मिट जायेगे |

achyutamkeshvam के द्वारा
February 1, 2013

वाह सर वाह।बहुत खूब।

drvandnasharma के द्वारा
January 28, 2013

सुंदर अभिव्यक्ति

yatindrapandey के द्वारा
January 21, 2013

उपेछा का बाजार गर्म है कही विरोध कही आंखे नम है आपने सही कहा है इस गुस्से को हम शांत नहीं होने देंगे.

priya के द्वारा
January 13, 2013

मन स्थिर कहाँ , कहीं समिधा -ऐसी आग हठीला ,कहीं कोमल है ,कहीं निर्भय खुद से कचोट , खुद से अपनापन कितना प्रकृत, कितना स्वभाबिक कभी मोन ,कभी रोशन कभी आलोक ,कभी अद्भुत मन स्थिर कहाँ , जहाँ है ये कहाँ कभी मन लक्ष प्राप्त करना जानता है तो कभी दीखता है सत्य यहाँ ढूढता है अपने को , अपने में ही सूर्य के प्रकाश की भांति ,जगता है रोज यहः कभी ढलता है, चन्द्र की भांति मन स्थिर कहाँ , जहाँ है ये कहाँ

rohit के द्वारा
January 8, 2013

सुबह सुबह घर से निकलते हुए, रस्ते पर चलते हए कुछ बन्दर दीखते है वे भी सिकुड़ते होंगे , सोचते होंगे काश सेक लें अपने हाथो को उनके पास न तो हमारी तरह आग है और न गरम पानी कई बार वे चिपक जाते है आपस में , फूलो की तरह पर जब सूरज चड़ने लगता है उपर , निकल आते है हर तरफ से वे , सकने लगते धूप सुस्ताने लगते है सोच कर डर लगता है की कैसे रात में ठितुरते होंगे वे हिलते नहीं होंगे अपनी जगह से हमें तो छुट्टी मिल भी जाते है , मगर उनके सभी दिन एक जैसे ही होते है रोज रोज जागते है , रोज रोज ठितुरते है , कोई नहीं जो उन सजीवो पर उपकार करे शायद वो रब भी नहीं , जिससे वे रोज धूप की दुआ मांगते है

prime के द्वारा
January 6, 2013

आज मैंने एक बूडा बचपन देखा बस में एक बूडा था , एक बचपन था बचपन हँस रहा था मगर बूडा चुप था बचपन ने अभी दुनिया में कदम रखा ही था मगर बूड़े को कब उसकी मौत ले उड़े क्या पता ? बचपन को तो कुछ भी आभास न था , मगर बूडा तो अपनी जिन्दगी से वाकिफ था बस से उतरने पर न तो बूडा दिखा न बचपन मगर दोनों की मुस्कराहट आखों में जैसे अब भी थी

rushabhshukla के द्वारा
December 28, 2012

nice poem


topic of the week



latest from jagran