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Harish Bhatt

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नजर का फेर

Posted On: 22 Feb, 2013 में

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देखा जो एक बार
तुमने मुस्‍करा कर
न जाने क्‍यों लगने लगा मुझे
तुम्‍हीं हो
मेरे जीवनपथ के साथी
बस फिर क्‍या
सारी दुनिया एक ओर
और तुम्‍हारा इंतजार एक ओर
इंतजार भी कैसा
जो करता रहा मुझे परेशान
इस इंतजार के चक्‍कर में
मैं ऐसा डूबा कि
एक पराये को अपनाने के फेर में
अपनों को दूर करता रहा
वक्‍त ने भी खूब बदला लिया मुझसे
न ही तुम आए
न ही काबिल बना मैं
अपनों ने भी छोड दिया साथ मेरा
जीवन पथ के सुनसान रास्‍तों पर
भटक रहा हूं अकेला तन्‍हा
तन्‍हाई में सोचता हूं कि काश
न देखा होता तुमने मुस्‍करा कर
न करता मैं तुम्‍हारा इंतजार
तो शायद आज
होती सारी दुनिया मेरी मुट़ठी में
नजरों के फेर ने बदल दी राहे
अब किसे दूं दोष मैं
यह तो मेरी ही नजरों को फेर था
जो एक मुस्‍कराहट को
समझ बैठा प्‍यार.

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

suraj के द्वारा
March 19, 2014

राह पर यु चल पडे ,सोच कर निकल पडे क्या मिला जो खो चले ,क्या था जो खो चले मिला यही से ,लिया यही से क्या था जो खो चले जो था ,कभी दिया नही किसी को  लेने की इच्छा कर चले .सोच लो क्या दिया 

suraj के द्वारा
March 19, 2014

जिवन के प्याय को .यु समछने निकला .मन मे विश्ववास लेकर कर गुजरने यु निकला  खुशी तो थी ,प्रेम भी होगा हरियाली तो थी ,पानी भी होगा कहानी तो थी, जवानी भी होगी अंतकरण तो था , इशवर भी होगा मा तो थी , ममता भी होगी गरीबी तो थी ,सच्चाइ भी होगा अमीरी तो थी , अंतर भी होगा

Anjali Vyas के द्वारा
March 2, 2014

कभी हम मुसकुराहट को प़़ंंय़ार समझते है तो कभी पयार को मुसकुराहट पर पयार को कोई भी कहा समझ पाया अब तक 

udayraj के द्वारा
September 11, 2013

नजर के फेर में सात फेरे अधुरे रह गए वो देखी जो एक बार पलट के हम दिवाने देखते रह गए निष्कबर्ष : ये प्याकर नहीं नासमझी है जीवन को नर्क बनाने वाली है बहुत ही सुंदर प्रस्‍तुति सर जी ।

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
February 23, 2013

आदरणीय, कितनी सहजता के साथ आपने अपनी नज़र के फ़ेर को व्यक्त किया है | हार्दिक बधाई |


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