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भारतीय राजनीति और चाय पार्टी

Posted On: 11 Mar, 2014 Politics में

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भारतीय राजनीति इन दिनों नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द ही घूम रही है. पक्ष हो या विपक्ष सबने मोदी पर ही निशाना साध रखा है. हर किसी की जबान पर सिर्फ एक ही नाम है- नरेंद्र मोदी.

कांग्रेस के रणनीतिकार यह बात अच्छी तरह जानते है कि वर्तमान में जनता का रूख उनके खिलाफ है. आगामी चुनाव में इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना ही है. अभी हाल में हुए विधानसभा चुनाव में यह बात साफ-साफ नजर आई. कांग्रेस ने दिल्ली की विधानसभा से भाजपा को दूर रखने के लिए अरविंद केजरीवाल को राजनीति की शतरंज पर अपना प्यादा बना लिया. यह प्यादा अपने आकाओं और जन समर्थन के बूते किंग तो बन गया. लेकिन किंग की कुर्सी को संभाल नहीं पाया और भाग खड़ा हुआ. लेकिन भागता कहां तक. इस बार कांग्रेसियों ने इसको शेर की मानिंद अपने विरोधियों की हवा खराब करने वाले नरेंद्र मोदी की गुफा (गुजरात) में धकेल दिया है. यूं तो किसी इंसान की ख्वाहिशों का कभी अन्त नहीं होता, पर अपनी हैसियत और योग्यता भी तो कुछ मायने रखती है. कांग्रेस के दिग्गज नेता ने कहा था कि एक चाय बेचने वाला इस देश का प्रधानमंत्री कैसे बन सकता है. तो आज चाय बेचने वाला का दम देख लीजिए, हरेक की जबान लड़खड़ा गई है, हर नेता का दिल तो बहुत चाहता है कि वह प्रधानमंत्री बने, पर शतरंज की बिसात पर दिमाग ने उनका साथ देना बंद कर दिया. न जाने क्या-क्या बोले जा रहे है – बेसिर की बातें. बेसिर की बातें इसलिए कि कोई भी अपनी और अपनों की बुराई तो नहीं करता. अगर नरेंद्र मोदी अपने गुजरात का बखान पूरे देश में कर रहे है तो क्या गलत कर रहे है.
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

नरेंद्र मोदी में बुराई खोजने वाले कौन सा दूध के धुले है.

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