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जिद्दी चाँद और इंसान

Posted On: 30 Jul, 2015 कविता में

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ऐ चांद
देखा इंसानी जज्बा
बड़ा इठलाया गगन में तू
तरह-तरह के करके ढोंग
बहलाया मासूमों को
बनकर मामा तूने खूब
कभी प्रेमिका बन तो कभी प्रेमी
प्यार की बयार खूब बहाता तू
और क्या कहूं तुझे
करवां चौथ या ईद पर
करते तेरा इंतजार तो
नखरे खूब दिखाता तू
बादलों की ओट में छिपते-छिपाते
मुस्कराते हुए लुकाछिपी खेलता तू
तेरे घटते-बढ़ते कद के चलते
तय करते थे हम अपने तीज-त्यौहार
सुंदरता का पैमाना बन इतराया खूब
तू भी जिद का पक्का, न आया धरती
इधर इंसान भी धुन का धनी
पहुंच गया तुझ तक और रख दिया
तुझ पर अपना कदम।

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