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गलतियां खुद की और आरोप दूसरों पर

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20टी विश्वकप में भारत-आस्ट्रेलिया मैच में विराट कोहली की धमाकेदार पारी की धूम है. लेकिन कही अगर ओवर ही समाप्त हो जाते तो विराट भी क्या कर लेते. वह तो समय से पहले संभल गए और कंगारुओं की बैंड बजा दी. बात इतनी सी है कि कामयाबी के लिए समय से पहले संभल जाना ही बेहतर होता है. समय बीत जाने के बाद हाथ मलने के सिवाय कुछ नहीं बचता. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत अगर समय से पहले अपने विधायकों को मना लेते तो शायद राज्य में राष्ट्रपति शासन की नौबत ही न आती. विधायक बागी हो गए. मुख्यमंत्री ने विधानसभा अध्यक्ष से बागियों की सदस्यता खत्म करने की गुहार लगा दी. उधर केंद्र की भाजपा सरकार ने विधायकों की विधायकी बचाने के लिए विधानसभा को निलंबित करने का निर्णय करने में कुछ घंटे की देरी क्या की, उधर विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी विधायकी निरस्त करने का फैसला सुना दिया. उत्तराखंड के प्रकरण में गलती खुद कांग्रेस की और दोष मढ़ दिया विपक्षी भाजपा पर. कांग्रेस खुद अपने विधायकों को संतुष्ट में नाकाम साबित हुई. यूं भी तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्षियों की मंशा तो सरकार को गिराने की ही रहती है. लेकिन जब पक्ष में ही फूट पड़ जाए तो कहने ही क्या, सोने पर सुहागा. सत्ताशीन कांग्रेस की आपसी फूट को हाथोहाथ लेते हुए विपक्षी भाजपा ने भी सरकार पर हमला बोल दिया. उस पर भी केंद्र में ही जब भाजपा ही काबिज हो. तब ऐसे में केंद्र का समर्थन तो मिलना ही था. कहते है न समय कभी किसी एक का नहीं होता. उसका चक्र घूमता रहता है, कभी इस ओर तो कभी उस ओर. आज हरीश रावत अपने बागियों पर आरोप लगा रहे है कि उन्होंने पार्टी की मर्यादाओं को तोड़ा है, तो शायद रावत यह भूल गए कि उन्होंने भी केंद्रीय मंत्री रहते हुए तीन साल पहले अपनी ही पार्टी विजय बहुगुणा को कुछ इसी अंदाज में मुख्यमंत्री पद से विदा करवाया था. तब हरीश रावत सही थे तो आज विजय बहुगुण और बागी भी सही है, अगर आज कांग्रेस के बागी विधायक गलत है तो उस समय हरीश रावत भी गलत थे. गलतियां खुद की और आरोप दूसरों पर, यह तो पुरानी आदत है, क्या करें उत्तराखंड का दुर्भाग्य कहे या नेताओं की पहाड़ जैसी महत्वकांक्षाएं और उनके बोझ तले दबे पहाडि़यों के सपने. आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो का नारा बुलंद न होता तो शायद आज पहाडि़यों को यह दिन न देखना पड़ता. अभी भी संभला जा सकता है, शायद विराट कोहली की धमाकेदार पारी से कुछ ही प्रेरणा मिल जाए और चुनाव के वक्त पहाड़वासी अपने मत का प्रयोग ईमानदारी से करके उत्तराखंड की तस्वीर और तकदीर ही बदल डाले. बस इसी इंतजार में.

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