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अहिंसा-हिंसा के बीच तालमेल मतलब सफलता

Posted On: 1 Oct, 2016 social issues,Social Issues में

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आराधना शक्ति की देवी की और जन्मदिन अहिंसा के पुजारी का. अहिंसा और हिंसा की जुगलबंदी के बीच सर्जिकल स्ट्राइक. विजय दिवस (दशहरा) के पहले ही विजय जैसा उल्लास. पानी रोकना था सिंधु का और रूक गया ब्रह्मपुत्र का. राक्षसी प्रवृति के विनाश के लिए मां ने काली का रूप धर राक्षसों का विध्वंस किया, तो महात्मा गांधी ने मानवता के लिए हिंसा को ही त्याग दिया. कोई एक गाल पर चांटा मारे तो दूसरा गाल भी आगे करने वाले महात्मा गांधी के देश का वक्त बदला, तौर-तरीके बदले, इतना बदले कि दूसरा गाल आगे करने की बजाय सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए जमीन में ही दफना दिया, उन्हें जिन्होंने भारत के जवानों को मौत की नींद सुला दिया था. दुश्मन का दुश्मन दोस्त की बात पर चलते हुए चीन ने पाकिस्तान के दुश्मन के खिलाफ ब्रह्मपुत्र का पानी ही रोक दिया, क्योंकि भारत ने हिंसा न करने की बजाय पाकिस्तान को अन्य मोर्चो पर पराजित करने के लिए सिंधु नदी समझौता रद्द करने की कवायद शुरू कर दी थी. हर बात एक दूसरे की पूरक होती है. यह भी अजीब इत्तेफाक है कि जहां अहिंसा का पुजारी हिंसा का शिकार हो गया, वहीं हिंसा (शक्ति) के बल पर राक्षसों का वध करने वाली देवी की आराधना करने वाले असुरी वस्तुओं का सेवन तक नहीं करते. कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि पूर्ण सफलता के लिए अहिंसा-हिंसा के बीच तालमेल होना जरूरी है. सिर्फ अहिंसा का गुणगान करने से दुश्मन छाती पर चढ़ आता है तो हिंसा करने से राक्षसी प्रवृत्तियां घर कर जाती है. इन दोनों के सटीक मिश्रण से ही सफलता का स्वाद चखा जा सकता है. जैसा कि उरी घटना के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अहिंसात्मक रूख अपनाते-अपनाते अचानक हिंसात्मक कार्रवाई के बाद भारतीयों को महसूस हो रहा है.

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