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पब्लिक को पूछता ही कौन है?

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एटीएम पैसे देगा या नही बाद की बात है, कई के तो शटर ही डाउन है. कैशलेस इन्डिया जब होगा तब होगा. यहा तो अभी से ही कैश लेस हो लिए. यू भी कब्र के हाल मुर्दा ही जानता है. जब शहरियो के हाल बुरे है तो सोचिए ग्रामीणो का क्या हाल होगा. उदाहरणो से जिन्दगी चला करती तो सब चान्द पर न चले जाते और कहते- सारे जहा से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा. 22 रुपल्ली मे माननीयो का दिन गुजरता होगा, जनता का नही. 10 रुपए की एक चाय पीकर परिवार को क्या धनिया खिलाएगे. (वैसे चाय वाले के पास 1990 रुपए नही है वापसी के लिए, क्योकि एटीएम दो हजार का नोट ही उगल रहा है) सब आल-जाल है. अब तभी सुकून मिलेगा जब कम से कम 10-15 मोटे पेट वाले नेता और लाला जेल मे चक्की चलाएगे. भूखे पेट एटीएम की लाइन मे खडी जनता के हौसले की मुस्कान तो दुनिया देख ही रही है, बस उन काइया टाइप के धनाढ्यो के चेहरो का खौफ देखना बाकी है, जिन्होने अपनो का भरोसा तोडते हुए विदेशो मे पैसा ठिकाने लगा रखा है. यह अलग बात है इन्तजार खत्म होने भी वक्त तो लगता है. समझ नही आ रहा है जब एक मामूली सी छुट्टी की एप्लीकेशन लिखने मे ही पसीने छूट जाते है. तब ऐसे मे मै पैसे का आनलाइन आदान-प्रदान कैसे करूगा. यू भी बैकिग संबंधी कामकाज अंग्रेजी मे होते है और यहा तो अंग्रेजी मे हाथ तंग है. फिर हिन्दी गंवार को पूछता ही कौन है.फोकट मे ही तीन पाच हो गया. खैर दिक्कत की बात नही है. लेकिन एक डर और खाए जा रहा है कि कही किसी ने एक चाय-समोसे के लालच मे 500 की बजाय 50000 अपने खाते मे पहुचा दिए तो सब आल-जाल हो जाएगा.वैसे तो खाता खाली ही रहता है, लेकिन भरने की संभावना पक्की है, जब खर्च लायक पैसे भी एटीएम से बाहर नही आ रहे है तो बैक बैलेस दो तीन माह मे बढ ही जाएगा ना.
रीडर्स पोल की क्या है जरुरत?
प्रतियोगिता में पाठक या पब्लिक सर्वे का क्या मतलब है. जब आयोजको ने रिजल्ट अपने मनमाफिक ही घोषित करना है. पाठक या पब्लिक की राय को दरकिनार करते हुए फाइनल रिजल्ट घोषित किये जाए तो सब फिक्स सा लगता है. लाखों की राय पर कुछेक की राय हावी हो जाए तो वो जनतंत्र नहीं राजतंत्र हो जाता है और राजतंत्र में पब्लिक को भेड़-बकरी से ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती है. ताजा मामला टाइम मैगज़ीन के पर्सन ऑफ द ईयर का है. जब डोनाल्ड ट्रम्प को ही विजेता घोषित करना था, तब रीडर्स पोल की क्या जरुरत थी. जबकि रीडर्स पोल में नरेंद्र मोदी जीते थे. अमेरिका में प्रेजिडेंट पद का चुनाव जितना और भारत की अर्थव्यवस्था में आमूल-चल परिवर्तन वह भी उस दौर में जब पाकिस्तान पोषित आतंक से दुनिया भयभीत हो. आतंक से परेशान अमेरिका जब आज तक पाक पर प्रतिबन्ध न लगा पाया हो. तब अमेरिकन मैगज़ीन वालों का क्या भरोसा.

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