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घातक न हो जाए कर्जमाफी

Posted On 24 Jun, 2017 social issues में

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यह बात समझ नहीं आ रही है कि किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं. जब आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है, फिर आत्महत्या क्यों? किसी के मरने या न मरने से नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता तो फिर मरना क्यों? हां जिन पर फर्क पड़ता है, वह होता है उसका अपना परिवार – मां, पिता, पत्नी बच्चे. अपनी असमय मौत पर उनको रोते-बिलखते छोड़ जाने से ज्यादा बेहतर होगा, सही समय का इंतजार करना. यह कटु सत्य है कि जब मुसीबत आई है तो जाएगी भी. इसमे थोड़ा वक्त जरूर लग सकता है. सोचिए क्या आत्महत्या के बाद परिवार के हालात सुधर जाएंगे, उनकी मुसीबतें कम हो जाएंगी. इसका सीधा जवाब होगा बिलकुल नहीं. जब आत्महत्या के बाद भी अपनों के हालात बेहतर नहीं होगे तो फिर मरना क्यों. जिंदा रहकर अपनों के साथ मिलजुल कर मुसीबत का सामना किया जाए. इसके लिए अपना रोजगार बदला जा सकता है. दुनिया में हजारों काम है अपनी रोजी-रोटी कमाने लायक. एक काम में लगातार असफलता मिलने के बाद काम बदला जा सकता है. यहां पर बात आ सकती है कि जब दूसरा आता ही नहीं तो खेती के अलावा क्या काम किया जाए. आखिर कोई इंसान पेट से सीखकर तो आता नहीं. राजनीतिज्ञों को अपनी राजनीति चमकाने के लिए मुद्दा चाहिए. एक कृषि प्रधान लोकतांत्रिक देश में भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर की जा रही राजनीति से इतर जाकर उन कारणों को जानना जरूरी है, जिनकी वजह से किसानों को आज आत्महत्या जैसे कदम उठाने पड़ रहे हैं. यूं भी इंसान कितनी भी तरक्की कर लें, लेकिन प्रकृति के आगे किसी का जोर नहीं चलता. पिछले साल बारिश न होने की वजह से सूखा पड़ गया तो इस बार बारिश होने की वजह फसल बर्बाद हो गई. इसमें वर्तमान सरकार से ज्यादा पूर्ववर्ती सरकारें दोषी है. जिन्होंने किसानों को पंगु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मसलन उनके ऋण माफ करना, रियायती दरों पर उनको बीज उपलब्ध कराना आदि. ताकि किसान अपना मुंह न खोले. यदि सरकारों ने फसलों की सिंचाई के लिए समुचित व स्थाई इंतजाम किए होते तो बारिश न होने की वजह से खेत सूखे होते और न ही बारिश होने पर फसल बर्बाद होगी. चलिए मान लिया इस बार बारिश होने पर गेहूं की फसल खराब हो गई. क्या यह सच नहीं है कि बारिश के पानी ने न जाने रेलवे स्टेशनों पर मालगाड़ी के इंतजार खुले पड़े न जाने कितने टनों गेंहू बर्बाद करके किसानों को रोने पर मजबूर किया है. पुरानी बदहाल हो चुकी व्यवस्था का ही असर है कि कोई किसान अपनी फसल में आग लगा रहा है, तो कोई खुद को मौत के हवाले कर रहा है. तब ऐसे में एक सुखद बदलाव की बयार बहाने की उम्मीद बनता भूमि अधिग्रहण पर सरकार विरोधियों का विरोध किसानों के कंधे पर चढ़ कर अपनी धूमिल होती जा रही सियासी जमीन बचाने के प्रयास से ज्यादा नहीं लगता. दूसरी ओर किसानों की कर्ज माफ़ी की मांग भी आने वक़्त में घातक ही साबित होगी. क्योंकि इस तरह से तो बैंक कभी भी अपना पैसा वापस नहीं ले सकेंगे. अगर खेती ख़राब हो सकती है तो कोई भी काम ख़राब हो सकता है, तब ऐसे में सिर्फ किसानों को कर्ज माफ़ी की सौगात क्यों, अन्य वह लोग भी कर्ज माफ़ी के हकदार है, जिन्होंने रोजगार शुरू करने के लिए बैंक ऋण लिया था, लेकिन किसी कारणवश उनका रोजगार चल नहीं पाया और वो बैंक के कर्जदार बन गए. कर्ज वसूली का समय बढ़ाया जा सकता है, लेकिन कर्जमाफी जायज नहीं है.

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